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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 106, Verse 4

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 106, verse 4 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 106 · श्लोक 4

संस्कृत श्लोक

देशाद्देशान्तरं दूरं प्राप्तायाः संविदो वपुः । निमिषेणैव तन्मध्ये चिदाकाशं तदुच्यते ॥ ४ ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे स्वप्न में यह असत्‌ ही त्रैलोक्य अवभासित होता है वैसे ही इस जाग्रत्‌ अवस्था में भौ अवभासित हो रहा है, इसमें जरा भी स्वप्न से निरालापन नहीं है