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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 106, Verse 5

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 106, verse 5 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 106 · श्लोक 5

संस्कृत श्लोक

यादृशस्तिष्ठतः स्वच्छं रसमाकर्षतस्तरोः । भवेद्भावो नभःस्वच्छस्तादृशं चिन्नभः स्मृतम् ॥ ५ ॥

हिन्दी अर्थ

जगत्‌-शब्द के अर्थ का (जगत्‌ का) न तो जाग्रत में संभव है और न स्वप्न में ही संभव है, वस्तुतः चिदाकाश का जो स्वकीय अवभासन है उसे ही अज्ञानीजन जगत्‌ मान बैठे हैं