Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 106, Verses 40–41
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 106, verses 40–41 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 106 · श्लोक 40,41
संस्कृत श्लोक
इदं विद्धि चिदाभासं परमार्थघनं घनम् ।
इत्थं स्थितं स्वयं भातं द्रष्टृदृश्यदृगात्मकम् ॥ ४० ॥
वस्तुतस्तु द्वयाभावान्नाभासि न च भासनम् ।
किमपीदमनिर्देश्यं सद्वाऽसद्वेति वेत्ति कः ॥ ४१ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे द्रवरूप जल द्रवहीन नहीं पाया जा सकता
वैसे ही चिन्मय चेत्य चित्व्यतिरिक्त नहीं हो सकता । जैसे उष्णतारूप अग्नि उष्णताशून्य मिले
यह कदापि सम्भव नहीं है, वैसे ही चिन्मय चेत्य (जगत्) चिदव्यतिरिक्त कदापि प्राप्त नहीं हो
सकता है