Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 106, Verse 43
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 106, verse 43 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 106 · श्लोक 43
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
चित्प्रकाशो यथाभानं यदा भावयति स्वयम् ।
स्वात्मा तथा तदेवाशु पश्यसीत्यसि दृष्टवान् ॥ ४३ ॥
हिन्दी अर्थ
जो वस्तु जिससे बनी है उसके
बिना वह कैसे प्राप्त हो सकती है । आकाश अशून्य कहाँ मिलता है ओर पृथ्वी अमूर्तं कहाँ प्राप्त
हो सकती है ?