Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 106, Verse 44
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 106, verse 44 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 106 · श्लोक 44
संस्कृत श्लोक
चिद्व्योमैवायमाकारः स्वे व्योम्न्येव न मुह्यति ।
स्वयमेव यथा स्वप्ने कोऽस्य पर्यनुयोगकृत् ॥ ४४ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे स्वप्न में घट, पट आदि पदार्थ चिदाकाशमय ही हे वैसे ही ये जगत् के
पर्वत, नगर आदि एकमात्र चिदाकाश के आभास हैं