Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 107, Verse 1
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 107, verse 1 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 107 · श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
अचेत्यचिन्मयं विश्वं विष्वगाभाति चिन्नभः ।
अत्र चिच्चेतनं चेदं चेत्यमप्येवमात्मकम् ॥ १ ॥
हिन्दी अर्थ
विस्तार से वर्णित जयत् की स्वप्न-दुल्यता से जिस प्रकार का विदाकाशमात्र तत्व ज्ञातव्य हैं,
उसके स्वरूप का पहले एक बार नहीं सैकड़ों बार वर्णन हो बुका हे तथापि शायद किन्ी मनन््दमतियों
की समझ में न आया हो इस तरह की संभावना कर उसके ऊपर दयावश पुनः उका स्वरूपलक्षण
ओर वटस्थलक्षणों से खूब भलीभाँति उपपादन छुनने के लिए श्रीरामचन्द्रजी पूछते हैं /
श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : हे ब्रह्मन्, जिसे आप परब्रह्म, चिदाकाश कहते हैं, उसका क्या स्वरूप
है ? कृपया ओर कहिए । यद्यपि आप पहले भी उसका लक्षण कह आये हैं, फिर भी आपके
मुखारविन्द से इस अमृत के तुल्य मधुर विषय को सुन रहे मुझे तृप्ति नहीं हो रही है
सर्ग सन्दर्भ
एक सौ पाँचवाँ सर्ग समाप्त एक सौ छठवां सर्ग विविध लक्षणों से पुनः चिदाकाश का प्रदर्शन-सा किया जाता है ओर चिदाकाश ही जगत् है इसका विस्तार से वर्णन।