Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 107, Verse 34
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 107, verse 34 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 107 · श्लोक 34
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हिन्दी अर्थ
श्रीरामचन््रजी की शंका में प्रथम श्लोक द्वारा अस् के भान का सभव स्वीकार कर द्वितीय
श्लोक द्वारा सत् परमात्मा का ही माया वश कैला भान होता हैं, यह उत्तर देते हैं /
कारण के अभाव से असद्रूप दृश्य की उत्पत्ति का ही संभव नहीं है, इसकी "दृश्यता" वह भी
प्रौढिनिर्देश है, प्रौढिवाद का अत्यन्त असंभव है