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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 107, Verse 35

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 107, verse 35 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 107 · श्लोक 35

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

अतएव यह द्रष्टा दृश्य असत्‌ का रुप नहीं हैं, किन्तु परमार्थ ब्रह्म का रुप हैं, ऐसा कहते हैं / द्रष्टा दृश्य भ्रमरूप जो यह जगत्‌ आदि कुछ भासता है, उसे आप परमात्मा का परम रूप जानिये