Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 107, Verse 43
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 107, verse 43 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 107 · श्लोक 43
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हिन्दी अर्थ
पहले प्रश्न का उत्तर देते हुए श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामचन्द्रजी, अपना
आत्मा भी चित्प्रकाश (ईश्वर) स्वयं जब प्राणियों की इच्छा, कर्म और वासना के उद्बोधानुसार
जिसकी जिस प्रकार (सत्यसंकल्परूप से) भावना करता है, उसको उस समय आप वैसे ही देखते
हैं और आपके रूप से उसी ने पूर्वोक्त द्रष्टा दृश्य भाव का अनुभव किया । इससे कार्यकारणभावादि
भेद की सिद्धि है