Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 107, Verse 44
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 107, verse 44 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 107 · श्लोक 44
इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।
हिन्दी अर्थ
वह कार्यकारण भावादि आकार चिदाकाश ही है जैसे कि मिट्टी ही घड़ा है,
इसलिए चिदाकाश ही इसका उपादान कारण है ओर मोह (अज्ञान) ही निमित्तकारण है।
शक्रा : यह केसे प्रतीत होता है 2
उत्तर : चूँकि यह स्वरूपभूत चिदाकाश का ज्ञान होने पर ही मोह को प्राप्त नहीं होता अन्यथा
मोह को प्राप्त होता है । जैसे स्वप्न में स्वयं ही मोह को प्राप्त होता हे, आत्मबोध से मोह का त्याग
करता है ।
शका : आत्मबोध में समर्थ इश्वर स्वयं जीव बनकर कयो मोह को प्राप्त होता हैं, क्यो प्रदद्ध
नहीं होता 2
उत्तर : स्वतन्त्र ईश्वर से “आप समर्थ होकर भी क्यों मोह में पड़ते हैं ?” - ऐसा प्रश्न या
आक्षेप करनेवाला कौन है ? अर्थात् कोई नहीं