Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 107, Verse 45
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 107, verse 45 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 107 · श्लोक 45
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हिन्दी अर्थ
दुग्धभाव से दधिभाव की प्राप्ति में और
पिण्डभाव से घटभाव की प्राप्ति में पूर्वभाव की निवृत्ति होने और उत्तरभाव की उत्पत्ति न होने पर
मध्य में पलकभर के लिए जो सन्मात्ररूप से प्रसिद्ध परमार्थं सत्य संवित् का स्वरूप है, वही
चिदाकाश है, यह मैं पहले कह चुका हूँ । वही (चिदाकाश ही) यह सब वस्तुरूप से प्रतीत होता है
अन्य नहीं, इसलिए इन सब पर सत्यता की प्रतीति हुई है