Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 107, Verse 5
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 107, verse 5 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 107 · श्लोक 5
संस्कृत श्लोक
केशोण्ड्रकनदीवाहधूमालीमौक्तिकादिवत् ।
यत्नं कचति तत्रास्ति नानुभूतेऽपि वस्तुता ॥ ५ ॥
हिन्दी अर्थ
जड़ों से पृथिवी का रस खींचते हुए वृक्ष का जैसा हासवृद्धिशून्य
आह्लादभाव प्रसिद्ध है वैसा ही चिदाकाश कहा जाता है