Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 107, Verse 6
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 107, verse 6 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 107 · श्लोक 6
संस्कृत श्लोक
तथैवास्मिञ्जगन्नाम्नि चिद्व्योम्नि कचने चिते ।
अनुभूतेऽपि निःशून्ये कास्थास्थाभावकश्च कः ॥ ६ ॥
हिन्दी अर्थ
जिसकी सकल कामनाएँ निवृत्त हो
चुकी हों, चित्त शान्त हो चुका हो, उस पुरष का जैसे सकलविषमताशून्य सहजसुखस्वरूपानुभव है
(कारण कि निर्विक्षेप दशा में “मे सुखपूर्णं हूँ” ऐसा सबको अनुभव होता है) वैसा ही चिदाकाश
है