Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 107, Verse 7
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 107, verse 7 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 107 · श्लोक 7
संस्कृत श्लोक
चिद्वालकल्पनाजाले शून्यात्मनि निरर्थके ।
अवस्तुभूते पृथ्व्यादौ भ्रान्तिमात्राम्बरोदये ॥ ७ ॥
हिन्दी अर्थ
निद्रा आने के पूर्व ओर जागरण के अन्त में (नींद न आई हो तुरन्त आने ही वाली हो,
जाग्रत में मन को भटकानेवाले विषयों का नाश हो गया हो याने जाग्रत के अन्त मेँ) स्वस्थ पुरुष
का जो भाव है, वह चिदाकाश कहलाता है