Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 107, Verse 50
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 107, verse 50 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 107 · श्लोक 50
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हिन्दी अर्थ
यह सृष्टिभ्रान्ति ही तत्त्वतः परिज्ञात
न होकर शास्त्रों में माया के नाम से पुकारी जाती है, लोक में "जगत्" नाम से कही जाती है,
अज्ञानियों द्वारा "अविद्या" कही जाती है और तत्त्वज्ञानियों द्वारा "दृश्य" नाम से वर्णित है