Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 107, Verse 51
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 107, verse 51 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 107 · श्लोक 51
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हिन्दी अर्थ
जैसे अविद्यमान पिशाच भी बालक को अपनी कल्पनावश विद्यमान-सा प्रतीत होता है वैसे ही
चिदाकाश प्रकाश को अपना चित्स्वभाव, जो पृथक् सत् न होता हुआ भी सत्-सा जगत्-पिशाच
के रूप में ज्ञात हुआ है