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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 107, Verse 52

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 107, verse 52 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 107 · श्लोक 52

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

जैसे स्वप्न में अद्यत्‌ में सत्‌ प्रतीति और निरवयव में सावयव प्रतीति होती हैं वैसे ही यहाँ पर भी समझना चाहिये, ऐसा कहते हैं । यद्यपि जगत्ता असत्य है, तथापि चिदाकाश को अपने स्वरूप में ही उस का अनुभव होता है । जैसे स्वप्न में चैतन्य की नगरता और पर्वतता असत्य होते हुए भी सत्य-सी निरवयव होते हुए भी सावयव-सी प्रतीत होती है वैसे ही यह जगत्ता सत्य और सावयवी प्रतीत होती है