Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 107, Verse 53
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 107, verse 53 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 107 · श्लोक 53
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हिन्दी अर्थ
मैं मेरु,
हिमालय आदि पर्वत हूँ, मैं रुद्र हूँ, में समुद्र हूँ, मे विराट् हूँ, यों स्वप्न में पर्वतता और नगरता की
प्रतीति की भाँति आकाश में चिति ही अहंता के अध्यास से अनुभव करती है