Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 107, Verse 63
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 107, verse 63 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 107 · श्लोक 63
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हिन्दी अर्थ
सृष्टि के प्रारम्भ में चित् से विसदृश (विलक्षण यानी जड) कार्य का उद्भव नहीं हो सकता है,
कारण कि विसदृशता में निमित्तभूत सहकारी कारणों का अभाव है । अर्थात् सुसदृश भी कार्य नहीं
हो सकता है, क्योकि भेदक कोई नहीं है, अतः कार्यत्व की असिद्धि है । अतः आद्य चित् ही दृश्य
है, उससे अतिरिक्त अणुमात्र भी नहीं है, यह स्वप्न दृष्टान्त से सिद्ध हो चुका है