Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 108, Verse 1
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 108, verse 1 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 108 · श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
श्रीराम उवाच ।
अविद्या दृश्यरूपेयं कचन्ती यस्य विद्यते ।
चिन्नभःस्वप्ननगरी दृश्यमानापि शून्यकम् ॥ १ ॥
हिन्दी अर्थ
विश्व के वेत्यभाव का निराकरण कर उसे चिन्मात्र सिद्ध करने के लिए प्रतिज्ञा करते हैं /
अचेत्य चिन्मय विश्व चिदाकाश चारों ओर भासित होता है, विश्व की सिद्धि चिदाकाशमात्र के
अधीन है, अतः उसे चिदाकाशरूप कहा । इसमें चित्, चेतन क्रिया ओर चेत्य यह त्रिपुटी चिन्मयी
है यह प्रतिज्ञार्थ है। इस प्रतिज्ञा में शुद्ध चिदात्मक प्रतिज्ञार्थ के रूप से अभिप्रेत है, यह शेष है
सर्ग सन्दर्भ
एक सौ छठवाँ सर्ग समाप्त एक सो सातवाँ खर्म अचेत्य पृथिवी आदि की अवस्तुता तथा स्वप्न की भाँति जगत् चित् का स्फुरण है, यह उपपादन।