Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 107, Verse 9
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 107, verse 9 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 107 · श्लोक 9
संस्कृत श्लोक
पृथ्व्याद्यसद्विचारैर्वा व्यर्थं यास्यति जीवितम् ।
किंचिच्च न ज्ञास्यति भोराकाशक्षालनोद्यतः ॥ ९ ॥
हिन्दी अर्थ
बाह्य
विषय ओर आभ्यन्तर विषयों के भोग से रहित जीवित पुरुष का शरद ऋतु के आकाश के समान
स्वच्छ जो भाव है, वही चिदाकाश है