Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 108, Verse 6
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 108, verse 6 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 108 · श्लोक 6
संस्कृत श्लोक
तत्रासीत्पार्थिवः कश्चिद्विपश्चिदिति विश्रुतः ।
यः सभायां सुसभ्यायां विपश्चित्त्वाद्विराजते ॥ ६ ॥
हिन्दी अर्थ
ठीक नहीं है, ऐसा फलित कहते हैं /
वैसे ही इस जगत्-नामवाले चित् के स्फुरणरूप अनुभूत होने पर भी विशेषतः शून्य चिदाकाश
में कौन आस्था है ओर आस्थाजनक कौन पदार्थ है ?