Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 109, Verses 34–37
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 109, verses 34–37 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 109 · श्लोक 34-37
संस्कृत श्लोक
सर्व एव समाकाराः सदृशावयवान्विताः ।
चञ्चलोच्चैःश्रवःप्रख्यं हयरत्नमवस्थिताः ॥ ३४ ॥
ससुवर्णशरापूर्णतूणीराः सुमहाशयाः ।
समानगुणकोदण्डाः समानवपुषः शुभाः ॥ ३५ ॥
समारोहन्ति ते यस्मिन्पुंसि नागे रथे हये ।
सर्वेषामरिदोषाणां नैव गम्यो भवत्यसौ ॥ ३६ ॥
पीत्वा धृत्वा चिरं कालं गर्भे पुरुषतापिताः ।
वेद्यामिव हितास्तत्र सागरा वडवार्चिषा ॥ ३७ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीवसिष्ठजी ने कहा : इसके बाद युद्धभूमि में क्षतविक्षत शरीरवाले
अतएव पीडित उत्तरदिशाधिपति यह कह ही रहे थे इतने में दूसरे आदमी ने प्रविष्ट होकर राजा से
यह कहा : महाराज, इस मण्डल के लोग पीपल के पत्तो की री कँपकँपी से विशाल बन गये हैं, चारों
ओर शत्रुओं की सेनाएँ प्रचुर मात्रा में व्याप्त है । शत्रुओं न लोकालोक तटों की तरह हमारी भूमि घेर
ली है, उनके खड्ग, गदा, प्रास और भालों के समूहों की कान्ति चमक रही है । पताका, शत्त्रासत्र
ओर योद्धाओं से भरे हुए चंचल और सुन्दर सम्पूर्ण सामग्रीवाले रथ इधर उधर चल रहे हैं । वे उड़े
हुए त्रिपुरासुर के नगरों के समूह से प्रतीत होते हैँ