Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 109, Verse 38
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 109, verse 38 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 109 · श्लोक 38
संस्कृत श्लोक
रत्नाश्वदेहकुसुमोत्करपूर्णदेहाश्चत्वार इन्दुहसितैरवभासयन्तः ।
सन्मूर्तयो हरय एव यथाब्धयो वा वेदा इवाहुतिहुतादनलात्प्रसस्रुः ॥ ३८ ॥
हिन्दी अर्थ
के झुण्ड, जो मांस के वृक्षों से भरे वनके तुल्य है, आकाश में सूँड़ों को उठाते हुए हाथी चिंघाड़ रहे
हैं