Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 11, Verse 1
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 11, verse 1 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 11 · श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
भुशुण्ड उवाच ।
शस्त्राणि दयिताङ्गानि लग्नान्यङ्गे निरम्बरे ।
यो बुद्ध्यमानः सुसमः स परस्मिन्पदे स्थितः ॥ १ ॥
हिन्दी अर्थ
भुशुण्डजी ने कहा : हे विद्याधर, वस्त्रों से ढके अपने शरीर में लगे हुए शत्रो के आघात और
तरुणी के स्तन आदि अंगों का अनुभव करके भी जो बुद्धिमान् पुरुष बिलकुल समभाव में स्थित है
वही परमपद में स्थित है । तात्पर्य यह कि जब तक वैसी स्थिति नहीं आ जाती तब तक मनुष्य को
इन्द्रियों के ऊपर विजयप्राप्त करने की दृढ़ चेष्टा ओर आत्मनिष्ठा से विरत नहीं होना चाहिए
सर्ग सन्दर्भ
दसवाँ सर्ग समाप्त ग्यारहवाँ सर्ग इन्द्रियों को जीतकर पूर्ण ब्रह्म परमात्मा में मन की स्थिति तथा देह आदि दृश्य पदार्थों में अनात्मभावना दृढ़ करनी चाहिए, यह वर्णन ।