Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 11, Verse 10
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 11, verse 10 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 11 · श्लोक 10
संस्कृत श्लोक
स्वेनैव संविदर्थेन पदार्थामग्नरूपिणा ।
तीर्यते गोष्पदमिव न तु दैवाद्भवार्णवः ॥ १० ॥
हिन्दी अर्थ
देह, इन्द्रिय आदि विषय पदार्थों में अहन्ता-
ममता की आसक्ति से अपने स्वरूप को तिरोहित न करके मनुष्य श्रवण, मनन आदि प्रयत्न
द्वारा निष्पादित आत्मसाक्षात्कार ज्ञान के प्रयोजनभूत अपने से ही इस भवसागर को गाय के
खुर के समान तैर जाता है, न कि मुझे इस संसारसागर से दैव (प्रारब्ध) पार लगायेगा, इस
प्रयत्न की उपेक्षा करके