Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 11, Verse 9
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 11, verse 9 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 11 · श्लोक 9
संस्कृत श्लोक
विषं विषत्वमजहद्यथा स्वान्तः कृमिः क्रमात् ।
न जायते न म्रियते म्रियतेऽपि च जायते ॥ ९ ॥
हिन्दी अर्थ
कनि में जैसे विकस्वभावद्वष्टि से जन्म और मरण नहीं होते, परन्तु आत्मस्वभावद्रष्टि से तो
होतेही हैं वैसे ही जीव में भी बह्यस्वभावद्ृष्टि से जन्म ओर मरण नहीं होते, किन्तु कीवस्वभावद्रष्टि
सेतो होते ही हैं; यह कहते हैं।
जैसे विष अपने विषरूपी स्वभाव को न छोड़कर ही अपने अन्दर क्रमशः कृमि होता है
तथा विषदृष्टि से न जन्म लेता है और न मरता ही है, किन्तु कृमिदृष्टि से मरता है, जन्म
भी लेता है, वैसे ही यह आत्मा ब्रह्म भी ब्रह्मस्वरूप से न जन्म लेता है और न मरता है, किन्तु
जीवस्वभाव से जन्म लेता ओर मरता भी है