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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 11, Verse 4

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 11, verse 4 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 11 · श्लोक 4

संस्कृत श्लोक

शस्त्राङ्गनानभांस्यङ्गलग्नान्यलमसंविदम् । अलग्नानीव शान्तात्मा यः पश्यति स पश्यति ॥ ४ ॥

हिन्दी अर्थ

आकाश के सदृश स्वच्छ विविध प्रकार के चमकते हुए शस्त्रों तथा देदीप्यमान अनेक स्त्रियों के असंवित्‌ में - शरीर में खूब संलग्न हो जाने पर भी (चिपक जाने पर भी) उन्हें असंलग्न-सा जो (५) जैसे कि शुक्ति में यह रजत नहीं है, किन्तु शुक्ति ही है, यह यथार्थ ज्ञान हो जाने पर उस शुक्ति में रजत के लाभ या हानि जनित किसी तरह की मानसिक पीड़ा नहीं देखी जाती, यह भाव है । शान्तात्मा देखता है, वही यथार्थ में देखता है यानी उसीको सचमुच यथार्थ में साक्षात्कारी ज्ञानवान्‌ समझना चाहिए