Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 11, Verses 5–6
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 11, verses 5–6 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 11 · श्लोक 5,6
संस्कृत श्लोक
विषं यथा स्वान्तरेव दुर्घुणी भवति स्वयम् ।
न च दुर्घुणता नाम विषादन्यास्ति काचन ॥ ५ ॥
स्वरूपमजहत्त्वेवं जीवतामधितिष्ठति ।
तथात्मा तत्परिज्ञानमात्रैकप्रविलापिनीम् ॥ ६ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे विष अपने ही स्वरूप में घुण (कीड़ा) आदि विकारभाव
को प्राप्त होता है ओर वह घुणता भी विष से अन्य कोई पदार्थ नहीं होती, वैसे ही अपने स्वरूप
का परित्याग न करते हुए ब्रह्म भी स्वतत्त्व के एकमात्र परिज्ञान से नष्ट हो जानेवाली जीवरूपता
को यानी जीवाकार विवर्तन को प्राप्त होता है कहने का मतलब यह कि जीवता कोई ब्रह्म
से भिन्न पदार्थ नहीं है