Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 11, Verse 7
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 11, verse 7 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 11 · श्लोक 7
संस्कृत श्लोक
जीवो भवति दुर्घूणोऽमृत्यात्मैव यथा तथा ।
अत्यजन्ती निज रूपं चिज्जडं रूपमृच्छति ॥ ७ ॥
हिन्दी अर्थ
अमरणस्वभाव जड़ विष अपने विषस्वभाव को न छोड़ते हुए
ही जैसे मरणस्वभाव कीटरूप जीव होता हे वैसे ही ब्रह्मचिति भी अपने रूप का त्याग न करती
हुई मरणस्वभाव जड़रूप को प्राप्त हो जाती है