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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 110, Verse 2

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 110, verse 2 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 110 · श्लोक 2

संस्कृत श्लोक

लुण्ठितग्रामनगरं प्रजाकुलमहाकुलम् । अग्निदाहज्वलद्देहं धूमाभ्रपटलावृतम् ॥ २ ॥

हिन्दी अर्थ

मन्त्रियों ने कहा : महाराज, हमने सब विचार कर निश्चय कर लिया है । शत्रु साम, दाम ओर भेद- इन तीन उपायों द्वारा काबू में आने लायक नहीं है, अतः उसपर दण्ड का विधान कीजिये