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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 110, Verse 3

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 110, verse 3 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 110 · श्लोक 3

संस्कृत श्लोक

शरजालमहाधूमच्छन्नार्कविलसत्तमः । क्षिप्रदृष्टरवि क्षिप्रमदृष्टरविमण्डलम् ॥ ३ ॥

हिन्दी अर्थ

महाराज, दान, सम्मान आदि से स्नेह ओर अनुप्रवेश (अपने पक्षवालों का ही शरणागति के बहाने काकोलूकीयन्याय से उनके विनाश के लिए उनके देश में प्रवेश), जिसका आजतक कभी उनके लिए प्रयोग नहीं किया गया, इस समय उन शत्रुओं पर प्रेम और अनुप्रवेशरूप कीर्ति हरनेवाले उपाय किये जाय, इसकी कथा ही क्या है