Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 110, Verse 31
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 110, verse 31 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 110 · श्लोक 31
संस्कृत श्लोक
मानवायुबलोन्मत्तनतप्रारब्धकुट्टनम् ।
धनानां प्राणपण्यानां नवमापणपत्तनम् ॥ ३१ ॥
हिन्दी अर्थ
इसके पश्चात् चार मूर्ति धारणकर राजा तेज की राशियों से
देदीप्यमान हो अग्निकुण्ड से ऐसे ही निकला जैसे कि तेज के पुंजों से देदीप्यमान भगवान् सागर
से निकले थे