Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 110, Verse 30
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 110, verse 30 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 110 · श्लोक 30
संस्कृत श्लोक
दिनं दिनकरस्येव नृपस्य शरणं गतम् ।
अनागतभटव्रातपिष्टार्धमृतमानवम् ॥ ३० ॥
हिन्दी अर्थ
उस शरीर को खाकर (आहुति रूप से गहणकर) अग्नि ने उसे
चतुर्गुण शरीर दिया । महान् लोगों द्वारा स्वीकृत वस्तु शीघ्र ही वृद्धि को प्राप्त होती है, इसमें
कुछ सन्देह नहीं है