Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 110, Verse 37
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 110, verse 37 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 110 · श्लोक 37
संस्कृत श्लोक
महाचटचटाशब्दस्फुटद्रववृहद्द्रुमम् ।
नारीहलहलारावरणन्नगरमन्दिरम् ॥ ३७ ॥
हिन्दी अर्थ
वे चार देह क्या थे चार सागर ही थे । मानों बडवाग्नि
ने पहले पीकर चिर कालतक उन्हें अपने गर्भ में धारण किया, तदुपरान्त उन्हें पुरुष के आकार
में परिवर्तित किया, तत्पश्चात् उन्हे वहाँ अग्निकुण्ड में रखा