Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 110, Verse 5
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 110, verse 5 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 110 · श्लोक 5
संस्कृत श्लोक
अनलप्रतिबिम्बौघैर्द्विगुणज्वलनायुधम् ।
रणभग्नमहाशूरप्राप्तेन्द्रवनितासुधम् ॥ ५ ॥
हिन्दी अर्थ
इसलिए इनके विषय
में साम-दान का प्रयोग करना अत्यन्त सुसाहस है (अविचारित कार्य है) इसका परित्याग कर
शीघ्र ही युद्ध का उद्योग कीजिये । इनके प्रतिकार का दूसरा उपाय है ही नहीं