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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 111, Verses 12–15

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 111, verses 12–15 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 111 · श्लोक 12,13

संस्कृत श्लोक

प्रस्फुरच्छत्रफेनाढ्यं हयहेषितफीत्कृतम् । समुल्लसद्धेतिजलं कचद्धाराकरं परम् ॥ १२ ॥ तरत्तरलमातङ्गतुरङ्गौघतरङ्गकम् । हेत्यम्भसि कचत्पापमुद्यद्गुलुगुलोदरम् ॥ १३ ॥ दरीदलनसंक्षुब्धमरुज्जनितघुंघुमम् । नतोन्नतकृताद्रीन्द्रमहास्पन्दशरीरकम् ॥ १४ ॥ मज्जन्मातङ्गतुरगहेलाहतमहीधरम् । अपारविचरत्पूरकल्लोलालमहाजलम् ॥ १५ ॥

हिन्दी अर्थ

घटाटोप के साथ टूटे फूटे हुए चलने मेँ रुकावट डालनेवाले तोमर इधर उधर लुढके हुए थे, अटारियों मे, जिनके ऊपर आकाश में वस्त्रपताकाएँ लहरा रही थीं, पट-पट शब्द हो रहे थे, हाथियों के दाँतों के शुक्लतादि गुणों के निकलने से, हथियारों की पत्थरों पर रगड़ लगने से ओर तीक्ष्ण टकार ओर हुंकार से युद्धोत्साह के उत्पादनवश दिग्गजों का मानों आह्वान हो रहा था