Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 111, Verse 16
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 111, verse 16 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 111 · श्लोक 16
संस्कृत श्लोक
अकालकल्पान्तदशासमुत्थानघनाकृतिम् ।
आक्रान्तरोदसीरन्ध्ररुधिरैकमहार्णवम् ॥ १६ ॥
हिन्दी अर्थ
लगातार बह
रही बाण-नदी के वेग से आकाशरूपी महासागर भर गया था, चल रहे चक्र, भाले, तलवाररूपी
मगरों से वह संग्राम सागर भयावना लगता था । सिंहनाद कर रहे योद्धाओं के परस्पर टकराने पर
कवचो की तीक्ष्ण टंकारों से हो रहे झंकारों से सब द्वीप गूँज उठे थे ॥१४.१५॥ पैरों के आघात से
खूब पीसे गये बाणो से चारों ओर कीचड़ हो गया था, बह रही रक्त की नदी के प्रवाह में रथ, हाथी
तक बहे जा रहे थे