Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 111, Verse 18
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 111, verse 18 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 111 · श्लोक 18
संस्कृत श्लोक
रत्नसीकरनीहारसंध्याभ्रपटलानतम् ।
क्वचित्पांसुपयोवाहपीतहेतिपयोधरम् ॥ १८ ॥
हिन्दी अर्थ
कहीं पर आपस में टकरा रहे शस्त्रास्त्रं से निकली हुई
ज्वालाओं से आकाश जल रहा था, देवत्व की प्राप्ति से बुढ़ापे के कारण बदन पर होनेवाली झुर्रियों
और सफेदी से मुक्त शूरवीर लोगों से स्वर्ग पट रहा था