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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 112, Verses 30–31

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 112, verses 30–31 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 112 · श्लोक 30,31

संस्कृत श्लोक

प्रविष्टा याचनं सह्ये लब्धाः सुरविलाद्द्वयम् । अनर्थेनाऽर्थ आयाति काकतालीयतः क्वचित् ॥ ३० ॥ पतिता दर्दुरारण्ये दशार्णा जीर्णपर्णवत् । भुक्त्वा विषफलान्यज्ञा मृतास्तत्रैव ते स्वयम् ॥ ३१ ॥

हिन्दी अर्थ

जल, वज ओर शस्त्रास्त्रों की वेगवती वृष्टि तथा प्रचण्ड आँधी से शत्रुसेना बँधरहित तालाब के जल की भाँति चारों ओर भाग खड़ी हुई । वह चतुरंगिणी सेना युद्ध से विमुख होकर वर्षाकाल की पर्वतनदी के महाप्रवाह के तुल्य भागती हुई चारों दिशाओं को चली गई