Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 112, Verses 41–42
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 112, verses 41–42 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 112 · श्लोक 41,42
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हिन्दी अर्थ
मरे हुए हाथी, घोड़े और योद्धाओं के समूहरूपी जीर्णशीर्णं पत्तों से वह
आच्छन थी, पीसे गये शरीरो के वसा और मांस के कीचड़ से उसमें चारों ओर कीचड़ ही कीचड़
हो गया था, चूर चूर की हुई हड्डियाँ ही उसमें कुछ स्थूल बालूवाले तट थे ओर खुरो से खूब
पीसी गई महा हड्डियाँ ही उसमें महीन बालूवाले तटप्रदेश थे । उसमें बह रहे पत्थरसमूहों तथा
लकड़ियों की चोटियोँ के आपस में टकराने से कटकट शब्द होता था