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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 112, Verse 40

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 112, verse 40 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 112 · श्लोक 40

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

मार्ग बनाने के लिए भाले, त्रिशुल, गदा, वल्लो को धारण करनेवाले भाग रहे योद्धाओं से बह रहे तालबन के समान अद्भूत थी, रो धो रहे कातर लोग ही उसमें गिर रहे मृगछौने थे