Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 113, Verse 1

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 113, verse 1 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 113 · श्लोक 1

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । बलान्यनुतरन्तोऽथ तदित्थं द्रवतां द्विषाम् । दूराद्दूरतरं प्राप्ताश्चत्वारस्ते विपश्चितः ॥ १ ॥

हिन्दी अर्थ

श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स, चेदिरूपी चन्दनों का वन, जहाँ मोतियों के हार, वस्त्र ओर साँप दर्शनीय होते हैं, कुल्हाडियों की धाराओं से कटकर दक्षिण सागर में गिर गया

सर्ग सन्दर्भ

एक सौ ग्यारहवाँ सर्ग समाप्त एक सौ बारहवाँ सर्ग जीवन लेकर भाग रहे जिस जिस देश के पैदल भट जहाँ-जहाँ जिस प्रकार विनष्ट हुए उसका वर्णन।