Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 113, Verse 12
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 113, verse 12 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 113 · श्लोक 12
संस्कृत श्लोक
लम्बप्रकाशगम्भीरं प्रसन्नं कान्तिमत्ततम् ।
रजोविरहितं रेजे खं मनो महतामिव ॥ १२ ॥
हिन्दी अर्थ
तंगणसेना के भक्षण के समय वहाँ का भूमितल चारों ओर घूम रहे उल्मुक (लाठी) लिये हुए
अतएव चमक रहे निशाचरो से नक्षत्र-मण्डल से आकाश की नाई शोभित हुआ