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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 113, Verse 34

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 113, verse 34 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 113 · श्लोक 34

संस्कृत श्लोक

अमूर्तान्प्रतिबिम्बेन हृदयस्थजगत्र्त्रयान् । चतुरो व्योमविपुलान्दिक्षु नारायणानिव ॥ ३४ ॥

हिन्दी अर्थ

अंग देश के योद्धा विद्याधरो का पद प्रदान करनेवाले वनफलों के भक्षण से स्वर्ग में विद्याधर होकर वहाँ विद्याधरियों के साथ क्रीडा करते हैं