Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 114, Verse 12
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 114, verse 12 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 114 · श्लोक 12
संस्कृत श्लोक
सरन्ति रत्नमूर्धानश्चलकानिलपायिनः ।
वानपूराः पर्वतकाः सर्पा इव नतोन्नतैः ॥ १२ ॥
हिन्दी अर्थ
एकार्णव-सा
विस्तृत आकाश, जो विस्तृत (फैले हुए) सूर्यप्रकाश से गम्भीर अतएव कान्तियुक्त और धूलिपटल
से रहित अतएव प्रसन्न था, महात्माओं के मन की भोति सुशोभित हुआ । महात्माओं का मन भी
आत्मज्ञान से गम्भीर होने से प्रकाशमय तथा रजोगुण से रहित होने के कारण प्रसन्न रहता
है