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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 114, Verses 13–15

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 114, verses 13–15 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 114 · श्लोक 13

संस्कृत श्लोक

भ्रमन्तो वीचिश्रृङ्गेषु मकरेभाः करोत्कटैः । हरन्ति सीकराम्भोदा मेघानुद्राविता इव ॥ १३ ॥ आवर्तवलिताकारः सीकरोत्करकीर्णदिक् । पूर्णत्वात्तु शिरोऽशक्तो म्रियतेऽत्युत्करः करी ॥ १४ ॥ विविधप्राणिसंपूर्णाः सजलाद्रिनतोन्नताः । यथैवाम्भोधयः सर्वास्तथैव द्वीपभूमयः ॥ १५ ॥

हिन्दी अर्थ

तदुपरान्त उक्त चार विपश्चितो ने आकाश के छोटे भाइयों के सदृश विस्तारयुक्त निर्मल आकारवाले, सम्पूर्ण दिशाओं तक फैले हुए चार समुद्रो को देखा