Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 114, Verses 16–20
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 114, verses 16–20 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 114 · श्लोक 16-20
संस्कृत श्लोक
आवर्तानात्मनोऽनन्यानप्यन्यानिव भास्वरान् ।
गृह्यमाणानसद्रूपान्दृश्यमानानपि स्फुटान् ॥ १६ ॥
तरङ्गतरलानन्तर्जडानप्यम्बुधिश्चलान् ।
धत्ते ब्रह्मजगन्तीव सान्तानप्यन्तवर्जितान् ॥ १७ ॥
यानन्तरिन्द्रवद्भानुमणीन्धत्तेऽम्बुधिर्बहून् ।
मन्थापहृतसर्वस्वो देवेभ्यः परिरक्षितान् ॥ १८ ॥
दृश्यमानान्महातेजस्तथा पातालतोऽप्यलम् ।
प्रतिबिम्बविभंग्यान्तरसत्यानिव गोपितान् ॥ १९ ॥
तेषां मध्यादेकमेकं प्रत्यहं पश्चिमार्णवे ।
निक्षेपाय क्षिपति यं तेन मन्ये दिनं भवेत् ॥ २० ॥
हिन्दी अर्थ
उनमें लहरों के
खण्डो और कल्लोलो से चारों ओर महान गुड-गुड शब्द हो रहा था, प्रचुर जलकणरूपी कुहरे को
हरनेवाले मेघो से उनका कलेवर बड़ा रमणीय प्रतीत होता था, रोगाकुल पुरुषों की भोति वे अपनी
काया को पसारे हुए थे, वे वायु से पीडित (आन्दोलित) थे, अतएव उनका कलेवर चंचल था और
वे तरंगरूपी बाहुओं को बार-बार ऊपर उठा रहे थे (८)॥१४.१५॥ वे संसार की नाई जड़ होते हुए
भी चेष्टामय थे, कल्लोलरूपी टेढे-मेढे खोडरों से भरे थे, (५) चक्राकार आवर्तरूप (जलभ्रमिरूपी)
दशाओं से व्याकुल तथा विस्तीर्णं थे । रत्नों की राशियों को धारण करनेवाले तटों की जगमगाहट
से उदय समय में मानों वे सूर्य को विशाल बना देते थे । शंखों के झुण्डों मे प्रवेश कर रहे वायु का
शब्द ही मानों उनकी तर्जन ध्वनि (डाँट-डपट की हुंकार) थी । बड़ी-बड़ी लहरों की परम्पराओं
की ध्वनियां से वे मेघों की गड़गड़ाहट से पूर्ण आकाश के आडम्बर से युक्त थे, उनके गोल-गोल
आवर्तो के विस्तार में मूँगे के वृक्ष जोर से घूम रहे थे, मगरो के झुण्डों के घर-घर शब्द ही उनके पेट
की गुड़गड़ाहट थी, व्हेल मछलियों की पूंछों के अगले भाग की मार से फटे हुए अतएव डूब रहे
जहाज के कोलाहल से भरे जा रहे थे, ऊनी वस्त्र पहने हुए नरकिन्नरों को ऊपर गर्दन निकाले हुए
कछुए ओर मगर निगल रहे थे, हजारों लहरों में प्रतिबिम्बित सूर्यो से वे जिसमें सहस्र सूर्य उदित हुए
हों ऐसे आकाश के तुल्य प्रतीत हो रहे थे