Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 114, Verses 27–28
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 114, verses 27–28 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 114 · श्लोक 27-28
संस्कृत श्लोक
चूतनीपकदम्बाढ्यगन्धमादनकन्दरान् ।
विशन्ति मेघहरिणास्तडित्तरललोचनाः ॥ २७ ॥
हिमवत्कन्दरोद्गीर्णा वल्लीवलयताण्डवम् ।
तन्वाना वायवो यान्ति विभिन्नाब्दाब्धिवीचयः ॥ २८ ॥
हिन्दी अर्थ
उन्होने (चार सागरों ने) आकाशरूपी खेत में बहुत से रत्न किरणरूपी अंकुर लगा रक्खे थे, स्वच्छ
सीपों के मुँह से गिरे हुई मोतियों से उनके बालूमय तटप्रदेश आच्छन्न थे, विविध प्रकार के रत्नों की
किरणरूपी रेशमी सूत्रों से उनका कलेवर चित्र-विचित्र हो रहा था, प्रविष्ट हो रही नदियाँ ही उनके
तुरी में प्रविष्ट किये (लपेटे) जा रहे तन्तु (सूत) थे, दशा (किनारा) रूपी दिशाओं के द्वारा इधर
उधर वे चारों ओर फैलाये गये थे, अतएव बुने जा रहे वस्त्रों के तुल्य प्रतीत हो रहे थे