Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 114, Verse 29
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 114, verse 29 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 114 · श्लोक 29
संस्कृत श्लोक
तात चूतकदम्बाग्रपरामर्शसुगन्धयः ।
वलयन्त्यब्धिकल्लोलान्गन्धमादनवायवः ॥ २९ ॥
हिन्दी अर्थ
कहीं पर वे इन्द्रनील मणियों के तटों से, जिसमें इधर उधर बिखरी हुई मोतीवाली सैकड़ों सीपें जड़ी
थी, अपनी नख शोभा को सैकड़ों सुन्दर (पूर्ण) चन्द्रमाओं युक्त सी दिखला रहे थे